कानपुर की तहसाील बिल्हौर की रोशनी पढने में होशियार है वह हमेशा से कक्षा में अब्बल आकर शिक्षकों और अभिवावकों की दुलारी है उसकी सहेलिया भी होशियारी के कारण इर्द-गिर्द ही रहती है। रोशनी बडे होकर डॉक्टर बनकर अपने माता पिता का नाम रोशन करना चाहती है लेकिन घर की आर्थिक स्थित अच्छी न होने के कारण इंटर के बाद उसने महाविद्यालय में दाखिला नही ले पाया है और न ही उसने डाक्टरी की प्रवेश परीक्षा का फार्म भरा है। रोशनी का परिवार सवर्ण जाति का है और उसके पिता किसानी करते है। पिता भाटिया कहते है बिटिया को डाक्टरी कराने की हैसियत हमारे पास नही है। परिवार में और भी काम है यदि है एक ही बच्चे पर ज्यादा खर्च करेंगे तो खाएगे क्या ? और दो सालों में रोशनी के हाथ भी पीले करने है उसका भी इंतजाम करना है........और सबको मालूम है कि अब किसानी में क्या मिलता है। आलू भी इस बार कितना सस्ता बिक रहा है। घर की माली हालत नाजुक देख रोशनी ने भी डाक्टर पढने का खवाब छोड अपनी बुद्धिमानी घरेलू कामों में लगा दी है। अब घर का चूल्हा चौका उसकी किताबे हैं और अम्मा के साथ सिलाई-कढाई उसकी पढाई। रोशनी होशियारी आर्थिक कमी के कारण चाहरदीवारी में कैद हो सदा के लिए दफन हो चुकी है।
रोशनी की कहानी सूबे में अकेली नही है प्रदेश के कई जिलों के सैकडों गांवो और मजरों में हजारों की तादाद में बेटिया ही नही बेटे भी घर आर्थिक बदहाली के चलते माध्यमिक शिक्षा के बाद पढाई से सन्यास ले घर बैठ जाते हैं। सामान्य आर्य वर्ग वाले परिवारों के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रबंध नाकाफी है और निजी सस्थानों की फीस इन परिवारों के लिए दूर की कौडी है इस लिए ये होना स्वाभाविक है। समुचित व किफायती शिक्षा नीति न होने के कारण प्रतिभा डूब रही है वहीं आरक्षण और अमीर-गरीब की खाई गलत नीतियों के कारण परवान चढ़ रही है।
Rahul Tripathi
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